सीस काटि पासंग दिया, जीव सरभरि लीन्हा।
जाहि भावे सो आइ ल्यो, प्रेम हाट हम कीन्ह।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि उन्होंने अपना अहंकार (सिर) काटकर अलग कर दिया है और अपनी पूरी आत्मा और जीवन को परमात्मा के प्रति समर्पित कर दिया है। उन्होंने प्रेम का एक ऐसा बाज़ार लगाया है जहाँ कोई भी वह व्यक्ति जो सच्चे प्रेम का इच्छुक है, आकर इस आत्म-समर्पण के फल को प्राप्त कर सकता है।
Meaning: Kabir declares that he has severed the head of his ego and offered it as a sacrifice, fully immersing his soul in the Divine. He has established a marketplace of love, inviting anyone who possesses a genuine longing for spiritual union to come and claim the fruits of this absolute surrender.









