जब लग धर पर सीस है, शूर कहावै कोय।
माथा टूटै धर लरै, कमद कहावै सोय।।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब तक व्यक्ति के शरीर पर सिर सलामत है, तब तक वह वीरता का दावा कर सकता है। लेकिन यदि सिर कट जाने के बाद भी कोई लड़ने की कोशिश करे, तो वह वीरता नहीं बल्कि मूर्खता और व्यर्थ का अहंकार है। यह दोहा वास्तविक साहस और निरर्थक जिद के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।
Meaning: Kabir asserts that as long as a man's head remains upon his shoulders, he may be called a warrior. However, if one attempts to fight after the head has been severed, such an act is not bravery but sheer folly. The verse distinguishes between genuine courage and the delusional persistence of a dead ego.









