बरस-बरस नहिं करि सकै, ताको लागे दोष।
कहैं कबीर वा जीव सो, कबहु न पावै मोष।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति वर्ष दर वर्ष निरंतर प्रयास और साधना नहीं कर सकता, वह अंततः दोषों और असफलताओं से घिर जाता है। ऐसा जीव, जिसमें धैर्य और निरंतरता का अभाव है, वह कभी भी आध्यात्मिक मुक्ति या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि सत्य की प्राप्ति केवल निरंतरता से संभव है।
Meaning: Kabir asserts that an individual who lacks the capacity for consistent, year-after-year spiritual practice and discipline inevitably falls prey to flaws and failures. Such a soul, devoid of perseverance and steadfastness, can never attain liberation (moksha), for the realization of Truth requires an unwavering and continuous commitment.









